Monday, January 05, 2009

पुराने रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें बनाने से बेहतर है

यह चिट्ठी पति पत्नी के रिश्तों के एक पहलू के बारे में है।

मैंने पिछली चिट्ठी 'मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने के एक तरीका यह भी' में लिखा था कि इन्होंने (उन्मुक्त) मुझसे आज तक यह नहीं कहा कि 'मैं तुमसे प्यार करता हूँ' और मुझे इन शब्दों का इंतजार है। मैंने यह भी लिखा था,
'यह मेरा जन्मदिन हमेशा याद रखते हैं पर लगभग दो दशक पहले मेरे जन्मदिन पर एक बार मुझसे कुछ नहीं कहा। मुझे लगा कि यह मेरा जन्मदिन भूल गये हैं। मैंने भी इन्हे याद नहीं दिलाया पर बुरा जरूर लगा।'
उस दिन क्या हुआ उसी का जिक्र उस चिट्ठी में है।

पिछले साल, यह मेरा जन्मदिन फिर भूल गये थे। यह एक बिमारी जूझ कर उठे थे ... मौत के करीब से गुजरे थे। मुझे यही लगा कि यह उसी उलझन में भूल गये। यह समय इन सब बातों को याद दिलाने का नहीं है। मैं भी भूल गयी।

मेरे घर के पास एक स्वामी जी योग सिखाते हैं। शाम को वे महिलाओं को अलग से सिखाते हैं। मैं अपनी सखियों के साथ वहां पैदल जाती हूं। उस दिन शाम को लौटते समय, मेरे घर के सामने कई कारें खड़ी थीं। मेरी सखी ने मुझसे कहा,
'क्या तुम्हारे यहां कोई दावत है।'
मैंने कहा नहीं, पर लगता है कि कुछ लोग मिलने आयें हैं।

अन्दर पोर्टिको में एकदम नयी बिना नम्बर की कार खड़ी थी। उसमें रिबन लगा था। मुझे लगा कि हमारा कोई मित्र अपनी नयी कार दिखाने आया है।


यह चित्र मेरा नहीं है। मैंने इसे यहां से लिया है। This photograph is not mine. I have taken it from the link mentioned above.

अन्दर ड्रॉइंग रूम में मेरे परिवार के सदस्य, मेरे मित्र थे, एक केक था जिसमें लिखा था जन्मदिन मुबारक और मुझे बाहर नयी कार, मेरे जन्ददिन पर इनकी तरफ से उपहार।

कार मारुति की ए-स्टार है जो कि ११ नवम्बर को निकली थी। यह उसका सबसे अच्छा और सबसे मंहगा (चार लाख दस हज़ार रुपये) वाला मॉडेल है।


यह हमारे कस्बे में बिकने वाली इस तरह की पहली कार है। इस कार को, न तो मैंने न ही इन्होंने, इसे चलाया या देखा था। उसके बारे में इन्होंने बिमारी के दौरान नर्सिंग होम के कमरे में टीवी में देखा था और हमारे मित्र से इसे चुपचाप ऑर्डर देने के लिये कहा था। सबके चले जाने के बाद, मैंने इनसे पूछा,
'इस समय इतना मंहगा उपहार क्यों? हमें इस समय न केवल पैसों की जरूरत है पर तुम्हें अपने स्वास्थ और समय का भी ध्यान रखना है। तुमने व्यर्थ में ही इस अप्रत्याशित मंहगे उपहार को खरीदा और दावत इन्तजाम करने में समय जाया किया। यह समय इसके लिये नहीं है।'
इनका जवाब था।
'हमने ३० साल साथ साथ गुजार लिये हैं। इतने समय बाद रिश्तों में बासीपन आ जाता है। ऐसे में यदि पुराने रिश्तों में नयापान न लाया जाय तो नये रिश्ते कायम हो सकते हैं। पुराने रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें कायम होने से बेहतर है।'
क्या कहेंगे उपहार देने इस तरीके को, इस मंहगे उपहार को, इस दर्शन को, और ऐसे ... व्यक्ति को।

मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जैसा कि इन्होंने अपनी चिट्ठी 'क्या आप अपनी पत्नी के लिये उपहार खरीद रहे हैं' के अन्त में लिखा है। यह तो इन्होंने खुद ही कर, मेरा नाम झूट मूठ से लगा दिया। मुझे कंप्यूटर का इतना ज्ञान नहीं कि मैं यह कर सकूं। भला ऐसे उपहार क्या कोई किसी को ... भेज सकता है? आप ही बताइये।

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सांकेतिक शब्द
culture, Family, life, Life, जीवन शैली, समाज, कैसे जियें, जीवन दर्शन, जी भर कर जियो,

Sunday, December 28, 2008

बादलों का घर आना और गालों की लाली

यह चिट्ठी शिलॉंग में हमारे कुछ अनुभवों को बताती है।

कुछ दिन पहले अरविन्द भाईसाहब ने एक चिट्टी 'मैं शर्म से हुई लाल ....' लिख कर गालों की लाली के बारे में चर्चा
की थी। इसके बाद अभिषेक भइया ने भी 'लाली देखो लाल की...!' चिट्ठी लिख कर कुछ अलग प्रकार के अनुभव के बारे में लिखा। इन चिट्ठियों पर मुझे २५ साल पहले गालों की लाली याद आयी। मैं बहुत दिन से लिखने की सोच रही थी पर बस लिख ही नहीं पायी। कुछ काम, कुछ अध्यापन, कुछ आलस।

नेहू (North East Hill University) शिलॉंग (Shillong) में स्थित केन्द्रीय विश्विद्यालय है। अस्सी के दशक में, मुझे नेहू (North East Hill University) में एक सम्मेलन में भाग लेने जाना था। यह सम्मेलन दशहरे के बाद था तो हम सब ने प्रोग्राम बनाया कि दशहरे में हम लोग कलकत्ता, नागालैन्ड, शिलॉंग घूमेगें फिर ये और मुन्ना वापस आ जायेंगे। मैं शिलॉंग में ही रुक जाउंगी और सम्मेलन में भाग लेकर अपने सहोयोगियों के साथ वापस कस्बे आ जाउंगी। हम शिलॉंग में नेहू के गेस्ट हाउस में ठहरे।

हम लोग सबसे पहले कलकत्ता, फिर नागालैन्ड और सबसे बाद शिलॉंग पहुंचे। शिलॉंग मेघालय की राजधानी है। मेघालय प्रदेश के पर्यटन विभाग का अपने प्रदेश के बारे में कहना है - 'जहां बादल घर आते हैं' (Where the clouds come home)।

आपको कभी मौका मिले तो अवश्य शिलॉंग जाइयेगा। यह बहुत सुन्दर जगह है। नेहू को भी देखियेगा। इसकी इमारत एक पहाड़ पर है। चारो तरफ जंगल है। हिरण वगैरह दिखायी पड़ते रहते हैं।

शिलॉंग में खसी (Khasi) लोग रहते हैं। यह मातृ प्रधान (Matrilineality एवं Matriachal) समाज है। पति, पत्नी के यहां रहने जाता है और उसी का सर नाम लेता है। सारी जमीन दौलत सबसे छोटी पुत्री को वरासत में मिलता है। इसलिये वहां की महिलाओं में आत्मविश्वास है, वे सशक्त हैं उन्हें महिला सशक्तिकरण की जरूरत नहीं है। दुकाने वगैरह महिलायें ही चलाती हैं। वहां हमें लड़कियों को अकेले पार्क में घूमते खरीददारी करते देखते थे और यह अच्छा लगता था।

हम लोग एक दिन घूमते घूमते पहाड़ी पर ढ़ाबे में पहुंचे। हम वहां चाय पीने बैठ गये। इस ढ़ाबे को एक एक लड़की चला रही थी। उसके गाल एकदम लाल/ गुलाबी थे। इन्होंने पूछा,
'इस लड़की ने फैशन कर रखा है या फिर इसके गाल प्राकृतिक रूप से लाल हैं?'

मैंने कहा कि मैं देख कर बताती हूं। वहां लड़कियें/ महिलायें एक खास तरह की ड्रेस पहनती हैं। इसे जैनसम (Jainsem) कहा जाता है। यह घुटने तक का लम्बा शॉल सा होता है जो कि कन्धों से पिन या फिर गांठ के द्वारा बंधा होता है।

इसके पहले कि मैं उस लड़की को गौर से देखूं और इनके सवाल का जवाब दूं वह लड़की हमारे पास आयी और गाल पर शॉल को रगड़ कर बार बार इन्हें दिखाती थी। वह अपनी खसी भाषा में कुछ कहती भी जा रही थी। इस बार बगल में बैठे सज्जन बोले,
'मैंने आपके पति का सवाल इस लड़की से खसी भाषा में बताया है। वह आपको शॉल से रगड़ कर दिखा रही है कि लाली नहीं छूट रही है। वह खसी भाषा में कह रही है कि यह प्राकृतिक है। उसने फैशन नहीं किया है।'

मैं नहीं समझती की उत्तर भारत में कोई लड़की इस तरह से हमारे सवाल का जवाब दे सकती। इनके हिसाब से यही समाज बेहतर है। मैं भी यही सोचती हूं।


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yeh poat hmaree Shillong ke anubhavon ke baare mein hai. yeh hindi (devnagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This is post is about our experiences of Shillong trip. It is in Hindi (Devnaagaree script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


सांकेतिक शब्द
Matriachal, Matrilineality, Jainsem, Khasi, NEHU, Shillong, खसी, जैनसम, मातृ प्रधान, शिलॉंग,
Travel, Travel, travel and places,
Travel journal, Travel literature, travel, travelogue, सिक्किम, सैर सपाटा, सैर-सपाटा, यात्रा वृत्तांत, यात्रा-विवरण, यात्रा विवरण, यात्रा संस्मरण,

Friday, April 04, 2008

मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने के एक तरीका यह भी

कुछ समय पहले शास्त्री भाईसाहब ने अपने चिट्ठे 'कच्चे धागे - Building Relations' पर एक चिट्ठी 'मैं तुमसे प्यार करता हूँ!!' नाम से लिखी। वे कहते हैं,
'आपसी स्नेह को प्रगट करना अधिकतर भारतीय पति पत्नी के लिये बहुत मुश्किल है ... इसमें एक बदलाव आना जरूरी है।'
इन्होंने (उन्मुक्त) आज तक यह शब्द मुझसे नहीं कहे, मुझे इन शब्दों का इंतजार है। हां, शास्त्री भाईसाहब की चिट्ठी पर, मुझे बीते दिनो कि एक घटना याद आयी।

यह मेरा जन्मदिन हमेशा याद रखते हैं पर लगभग दो दशक पहले मेरे जन्मदिन पर एक बार मुझसे कुछ नहीं कहा। मुझे लगा कि यह मेरा जन्मदिन भूल गये हैं। मैंने भी इन्हे याद नहीं दिलाया पर बुरा जरूर लगा। उस दिन शाम को हमारे मित्र की बिटिया के जन्मदिन की पार्टी एक रेस्ट्रां में थी। उस समय इनकी एक मीटिंग थी इसलिये ये वहां नहीं जा सकते थे। इन्होने मुझसे जाने के लिये और एक उपहार देने के लिये कहा। बहुत गुस्सा आया - मेरा तो जन्म दिन भी याद नहीं और दूसरे के लिये उपहार।



मैं और मुन्ना शाम को रेस्ट्रां में गये। थोड़ी देर बाद मुझे लगा कि हमारे मित्र और रेस्ट्रां मालिक मेरे बारे में बात कर रहे हैं। वे मेरी तरफ देख रहे थे और कुछ इशारा सा कर रहे थे। मुझे कुछ अजीब सा लगा। इसके बाद रेस्ट्रां मालिक, फूलों का एक सुन्दर सा गुलदस्ता लाया। मैं समझती रही कि यह तो उस लड़की के लिये होगा जिसका जन्मदिन है पर उसने वह मुझे भेंट किया और कहा कि कोई सज्जन इसे मुझे देने के लिये कह गये थे। मैंने उससे उस सज्जन का नाम पूछा तो उसने कहा कि वह उस व्यक्ति को शक्ल से पहचानता है पर नाम नहीं मालुम। गुलदस्ते के साथ लगे कार्ड में लिखा था
'क्या बताने की जरूरत है कि यह गुलदस्ता किसकी तरफ से है।'

हमारे मित्र ने बताया कि वह रेस्ट्रां मालिक, मुझे गुलदस्ता देने में डर रहा था कि कहीं मैं बुरा न मान जाऊं। वह हमारे मित्र से इसी बारे में पूछ रहा था। रेस्ट्रां मालिक को वास्तव में इनका नाम नहीं मालुम था पर जब उसने हमारे मित्र को गुलदस्ता देने वाले का हुलिया बताया तो मित्र ने उसे अश्वस्त किया कि वह व्यक्ति कोई और नहीं पर मेरे पति ही हैं, वे इसी तरह के काम करते हैं। गुलदस्ता देने में कोई हर्ज नहीं।

जन्मदिन पर प्यार जताने का एक तरीका यह भी। जीवन में कुछ न कुछ अप्रत्याशित होते रहना चाहिये।


The photograph published is not mine. I have taken it from here and it is courtesy them.
Hello, I am using this photograph for non profit purpose. Please do let me know if you have any objection. In that event, I will remove it.

Saturday, March 08, 2008

महिला दिवस ८ मार्च को क्यों मनाया जाता है?

अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आवाहन पर, यह दिवस सबसे पहले सबसे पहले यह २८ फरवरी १९०९ में मनाया गया। इसके बाद यह फरवरी के आखरी इतवार के दिन मनाया जाने लगा। १९१० में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अन्तरराष्ट्रीय दर्जा दिया गया। उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि, उस समय अधिकर देशों में महिला को वोट देने का अधिकार नहीं था।

१९१७ में रुस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल भी ऐतिहासिक थी। ज़ार ने सत्ता छोड़ी, अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिये। उस समय रुस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर। इन दोनो की तारीखों में कुछ अन्तर है। जुलियन कैलेंडर के मुताबिक १९१७ की फरवरी का आखरी इतवार २३ फरवरी को था जब की ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन ८ मार्च थी। इस समय पूरी दुनिया में (यहां तक रूस में भी) ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है। इसी लिये ८ मार्च, महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।


ऐसे मैं इनकी जेबों से अक्सर बहुत कुछ चुराती रहती हूं पर आज मैंने इनके उन्मुक्त चिट्ठे की इस चिट्ठी से यह लेख चुराया है।

इसे आप यहां इनकी आवाज में सुन सकते हैं। यह तो आप जानते हैं कि ये ogg फॉरमैट में पॉडकास्ट करते हैं। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
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सुन सकते हैं। ये ogg फॉरमैट में क्यों पॉडकास्ट करते जानने के लिये आप इनकी चिट्ठी 'पापा, क्या आप उलझन में हैं' पढ़ सकते हैं।

Sunday, March 02, 2008

मुझे, जब विंडोज़ विस्टा की याद आयी

मैं अध्यापिका हूं, गणित पढ़ाती हूं। मुझे काम की जगह से लैपटॉप मिला है। इस पर विंडोज़ विस्टा ऑपरेटिंग सिस्टम था। मैं इसके पहले डेस्कटॉप कंप्यूटर पर काम करती थी, जिस पर फेडोरा है। मुझे लैपटॉप पर काम करने में मुश्किल पड़ी।
  1. यह बहुत धीमा चलता था। किसी प्रोग्राम को चलाने के बाद बहुत देर तक इंतजार करना पड़ता था।
  2. लिनेक्स से विंडोज़ पर काम करना।
यह लैपटॉप मेरा नहीं है, इसलिये इस पर फेडोरा करवाना ठीक नहीं समझा। अन्त में, इन्होने इस पर इसे विंडोज़ विस्टा डाउनग्रेड कर विंडोज़ एक्स पी करवा दिया। इसमें वे सारे प्रोग्राम डाल दिये जिस पर मैं फिडोरा पर काम करती थी।

हमारे घर में हिन्दी की स्पैन पत्रिका आती है। इसके जनवरी - फरवरी २००८ के अंक में एक कार्टून निकला है जो कि इस प्रकार है।


यह कार्टून स्पैन पत्रिका की जनवरी- फरवरी २००८ अंक में निकला था और उन्हीं के सौजन्य से है।

इसके चित्र के टीवी सेट पर लिखा है,
'प्रस्तुत की जा रही फ़िल्म ऐसे फ़ॉरमैट में बनायी गयी है कि इसे सिर्फ नए और मंहगे टीवी सेट पर ही देखा जा सकता है'।
इन्होंने इसे मुझे दिखाया - बस इसी को देख कर मुझे अपने लैपटॉप पर विंडोज़ विस्टा की याद आयी :-)