Saturday, April 07, 2007

मालती जोशी

मुन्ने के बापू आजकल अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर महिला सशक्तिकरण की कहानी 'आज की दुर्गा' नाम से बता रहें है। वे इसे अपने पॉडकास्ट बकबक पर सुना भी रहें हैं। इस बारे में वे कभी कभी मुझे बताते हैं। इसी सिलसिले में मुझे मालती जोशी कि एक कहानी याद आगयी। इस कहानी का नाम 'परम्परा' है जो कि मैंने उनकी पुस्तक 'बाबुल का घर' में पढ़ी है।

यह कहानी एक बेटी की तरफ से है जिसका भाई अमेरिका में रहता है। वह अपने पति के साथ भारत में रहती है। उसके माता पिता उसी के साथ रहते हैं। वे कुछ समय के लिये अमेरिका चले जाते हैं जहां पिता कि मृत्यु हो जाती है। पिता मरते समय मां से कह जाता है कि अपने कपड़े और रहने का ढ़ंग उनकी मृत्यु के बाद भी नहीं बदलना। भाई, मां को लेकर वापस छोड़ने आता है। वह कुछ परेशान सा है वह चाहता है कि मां विधवा वाले वस्त्र के कपड़े पहने और उसी ढ़ंग से रहे। दमाद भी यही चाहते हैं अन्त में बेटी को आश्चर्य और दुख होता है कि मां उसके विरोध करने के बावजूद वैसे ही वस्त्र धारण कर लेती है जैसा कि पुत्र या समाज चाहता था। कहानी का अन्त कुछ इस तरह से बेटी के शब्दों के साथ होता है,
'मेरे सारे तर्क हार गए थे।। अम्मा ने कितने नपे-तुले शब्दों में नारी-जीवन को परिभाषित कर दिया था। उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है। वह हमेशा से पुरूष के अधीन रही है, चाहे वह पिता हो, पति हो या बेटा। यही उसकी नियति है, यही त्रासदी है और यही परम्परा है।'
साधारणतया आज की दुर्गा तो यही है। मुन्ने के बापू तो शायद कल की दुर्गा की कहनी अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर बता रहें हैं।

मालती जोशी जी कि कहानियां मन को छूने वाली होती हैं। अपनी कहानियों के बारे में, वे कहती हैं,
'जीवन की छोटी-छोटी अनुभूतियों को, स्मरणीय क्षणों को मैं अपनी कहानियों में पिरोती रही हूं। ये अनुभूतियां कभी मेरी अपनी होती हैं कभी मेरे अपनों की। और इन मेरे अपनों की संख्या और परिधि बहुत विस्तृत है। वैसे भी लेखक के लिए आप पर भाव तो रहता ही नहीं है। अपने आसपास बिखरे जगत का सुख-दु:ख उसी का सुख-दु:ख हो जाता है। और शायद इसीलिये मेरी अधिकांश कहानियां "मैं” के साथ शुरू होती हैं।'

मालती जोशी का जन्म ४ जून १९३४ को औरंगाबाद में हुआ था । आपने आगरा विश्वविद्यालय से वर्ष १९५६ में हिन्दी विषय से एम.ए. की शिक्षा ग्रहण की। अब तक अनगिनत कहानियां, बाल कथायें व उपन्यास प्रकाशित कर चुकी हैं। इनमें से अनेक रचनाओं का विभिन्न भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी किया जा चुका है। कई कहानियों का रंगमंचन रेडियो व दूर दर्शन पर नाट्य रूपान्तर भी प्रस्तुत किया जा चुका है। कुछ पर जया बच्चन द्वारा दूरदर्शन धारावाहिक सात फेरे का निर्माण किया गया है तथा कुछ कहानियां गुलजार के दूरदर्शन धारावाहिक किरदार में तथा भावना धारावाहिक में शामिल की जा चुकी हैं। इन्हें हिन्दी व मराठी की विभिन्न व साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत किया जा चुका है। मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा वर्ष १९९८ के भवभूति अलंकरण सम्मान से विभूषित किया जा चुका है।

मालती जोशी भोपाल में स्नेहबंध, ५०-दीपक सोसाइटी, चूना भट्टी- कोलार रोड, पर रहती हैं। इन्हें अक्सर भोपाल काम से जान पड़ता है। मैं इनसे कहूंगी कि अगली बार मालती जी से मिल कर कर आयें।

चलती हूं, मुन्ने ने कहा था कि राजमां बनाने की विधि लिख कर भेजो। इसे भी पूरा करूं।