Tuesday, November 28, 2006

भारतीय भाषाओं के चिट्ठे जगत की सैर

मैं अनूप भाईसाहब का धन्यवाद देना चाहूंगी कि उन्होने चिट्ठा चर्चा में मेरी रूस यात्रा की चिट्ठी का जिक्र करते हुऐ यह बताया कि,
'कुछ दिन पहले हमारे एक कलकतिया-कुलीग ने फोनवार्ता के दौरान बताया कि प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक टेलीग्राफ में मुन्ने के बापू और मुन्ने की मां के ब्लाग का जिक्र हुआ था। वह विवरण तो हम न देख पाये।'
उत्सुक्तावश, मैंने इस लेख को खोजा, तो पता चला कि यह लेख टेलीग्राफ समाचारपत्र में १९ नवम्बर को 'Hitchhiking through a non-English language blog galaxy' नाम के शीर्षक से छपा है। यह पढ़ने योग्य है। इसमें भारतीय भाषा के चिट्ठों का इतिहास, इसकी विविधता, और परिपक्वत्ता की चर्चा है।

इस लेख में कुछ तो मेरे चिट्टे की चिट्ठियों के बारे में है पर वास्तव में, यह लेख, मेरे चिट्ठे 'मुन्ने के बापू' के बारे में न हो कर, मुन्ने के बापू यानि उन्मुक्त के चिट्ठों की चिट्ठियों के बारे में है।

 कुछ दिन पहले, इनके (उन्मुक्त के) इमेल पर मेरे लिये सुश्री मंजुला सेन का एक इमेल अंग्रेजी में आया था। मुझे वे नाम से महिला लगीं। यह इमेल चूंकि मुझे संबोधित था इसलिये इन्होने मुझसे जवाब देने को कहा। सुश्री सेन ने लिखा था कि, वे टेलेग्राफ अखबार की संवादाता हैं, उन्हें मेरा चिट्टा अच्छा लगा, वे हिन्दी चिट्ठेकारी के बारे में लिख रही हैं, और मुझसे बात करना चाहती हैं।

मैंने सुश्री सेन की इमेल का जवाब तो दिया पर उनसे बात नहीं की। इस लेख में कुछ बातें स्पष्ट नहीं है। गलती मेरी ही है, मुझे उनसे बात कर लेनी चाहिये थी। खैर, मैं बताना चाहूंगी कि मैंने उनसे बात क्यों नहीं की और जो बातें उनके लेख में स्पष्ट नहीं है, उसे भी स्पष्ट करना चाहूंगी।

उन्मुक्त, आजकल अपने चिट्ठे पर हरिवंश राय बच्चन और रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन के बारे में लिख रहें हैं। यदि आप उसको पढ़ रहे होंगे तो मुझे यह बताने की जरूरत नहीं कि इन दोनो में से, इनको किसका जीवन पसन्द है और किसका नहीं।

 फाइनमेन बहुत बड़े व्यक्ति थे -सैकड़ो साल में वैसा कोई बिरला इन्सान पैदा होता है। उनकी हर बात का ध्यान देने और उसका अनुचरण अपने जीवन में करने की जरूरत है। ईश्वर, न तो सबको वह काबलियत देता है और न ही सब अपने जीवन में उतने ऊपर उठ सकते हैं, पर उस तरह का जीवन जीने का प्रयत्न तो समान्य व्यक्ति भी कर सकता है। उन्मुक्त, की जीवन शैली भी बहुत कुछ वैसी ही है, उसी तरह की ... हरकतें, उसी तरह की बेवकूफी ... इन बेवकूफियों में दो तीन बार जान खतरे में पड़ गयी। हांलाकि महत्वता की नजर में, इनका जीवन साधरण है।

 उन्मुक्त ने अभी अपने चिट्ठे पर फाइनमेन के बारे में एक चिट्ठी यहां पोस्ट की किसी बात को इस लिये न मानो क्योंकि कोई अधिकारी या विशेषज्ञ कह रहा है उसे तर्क पर परख कर देखो। इनके लिये जूते पर बढ़िया पौलिश करने वाला या बढ़िया सड़क चमकाने वाला, किसी भी बड़े आलसी अधिकारी से ऊचां है। यह कहते हैं कि,

'अपने देश में ऐसा नहीं होता। अपने देश में लोग अक्सर दूसरे के नाम और वह क्या करता है से ज्यादा प्रभावित होते हैं न कि उसके काम से।'
यह अपने विचारों को सबके सामने रखना चाहते हैं, उसी से पहचाने जाना चाहते हैं, न कि अपने नाम या परिचय से। इन्होने इस बात पर भी विचार किया था कि हिन्दी में चिट्ठा लिखना शुरू किया जाय कि अंग्रेजी में - पर लगा कि आज नहीं तो कल हिन्दी के द्वारा ज्यादा देशवासियों के बीच ज्यादा अच्छी तरह से पहुंचेगें, इसलिये इसी साल फरवरी के अन्त में हिन्दी में चिट्ठा लिखना शुरू किया।

मेरे पास तो नहीं, पर इनके पास अक्सर इमेल आता है जिस पर लोग इनसे इनका परिचय पूछते हैं, लिखते हैं कि क्या मिल चुके हैं, या मिलने की बात करते हैं। इनका हमेशा यही जवाब रहता है कि

'मैं भारत के एक छोटे शहर से, एक साधारण व्यक्ति हूं। मेरा चिट्ठा ही मेरा परिचय है। मैं अपने विचारों के लिये पहचाने जाना पसन्द करता हूं न कि नाम या परिचय के कारण।'
कई लोग इस पर, इनको गलत भी समझ लेते हैं। चूंकि यह अपने विचार और जो इन्हें पसन्द है - लोगो को बताना चाहते हैं, इसलिये इनकी सारी चिट्ठियां कॉपीलेफ्टेड हैं। इन्हें किसी को भी कॉपी करने, संशोधन करने, की स्वतंत्रता है - इन्हें (उन्मुक्त को) श्रेय देंगे तो अच्छा है, न देंगे तो भी चलता है।

भारतीय पत्नियां या तो पतियों को अपने रंग में रंग लेती हैं, या उनके रंग में रंग जाती हैं - मैं उनके रंग में हूं। बस, मेरे चिट्ठे की चिट्ठियां कॉपीलेफ्टेड नहीं हैं, वे मेरी हैं। महंगाई है, क्या मालुम कभी दो पैसे कमा लूं। (कृपया अन्त में नोट -१ देखें।)

यही कारण था कि मैंने सुश्री मंजुला सेन से बात नहीं की, पर उन्हें बाकी सारे चिट्ठों की सूची भेज दी थी ताकि वे उनसे बात कर लेख लिख दें। मै यही समझती रही कि उन्होने बाकी चिट्ठेकार बन्धुवों से बात कर, लेख लिख दिया होगा। सुश्री सेन के द्वारा लिखे हुऐ इस लेख की कहीं और भी चर्चा नहीं आयी, इसलिये बात आयी और गयी हो गयी।

इस लेख में हम लोगों के लिये गीक शब्द प्रयोग किया गया है। मैंने इनसे इसका अर्थ पूछा, तो इन्होने बताया कि इसका अर्थ समय समय के अनुसार बदलता रहा है और यह इस पर भी निर्भर करता है कि किस तरह से प्रयोग किया गया है। मैं इसके अर्थ के बारे में भ्रमित हूं।

मैं पढ़ाती हूं; विज्ञान से सम्बन्ध रखती हूं। इसी कारण मुझे कभी, कभी विदेश जाना पड़ता है। मैं इसी सिलसिले में रूस, जापान, अमेरिका, और कैनाडा जा चुकी हूं; बाहर कुछ साल पढ़ाया भी है। आने वाले समय पर, कुछ अनुभवों को चर्चा करने का प्रयत्न करूंगी।

मुझे कंप्यूटर का थोड़ा बहुत ज्ञान है। इमेल देख लेती हूं और कर भी लेती हूं। यह भी इसलिये शुरु हुआ क्योंकि यह न तो फोन पर बात करना पसन्द करते हैं न ही इन्टरनेट पर चैट करना। इन्हें इमेल के द्वारा ही बात करना पसन्द है। मैं इन्टरनेट पर खोज भी कर लेती हूं। इनकी मदद से, हिन्दी में चिट्ठा भी लिख लेती हूं। इससे ज्यादा मुझे कंप्यूटर का ज्ञान नहीं है।

यह फाइलों को इधर उधर करते हैं। इनका काम न तो कंप्यूटर से संबन्धित है और न ही यह विज्ञान संबन्धित फाइलें इधर उधर करते हैं। इन्हे न केवल विज्ञान पर, शायद सब विषय पर रुचि है। यह ओपेन सोर्स के समर्थक हैं और उसी पर काम काम करना पसन्द करते हैं। इनका मानना है कि भविष्य ओपेन सोर्स का ही है और इसी में अपने देश का भविष्य है। यह और इनका परिवार महिलाओं के समान अधिकारों के न केवल समर्थक हैं पर उस पर स्वयं अमल भी करते हैं। मैं बाहर हमेशा अकेली ही गयी जो कि मेरे परिवार के समर्थन के बिना सम्भव नहीं था। ये स्वदेशी में भी विश्वास रखते हैं और हमेशा न केवल कहते हैं, पर अमल भी करते हैं,

'Be Indian, buy Indian'
इनके मुताबिक इस ग्लोबीकरण में डब्लू.टी.ओ. का केवल यही हल है।

कुछ दिन पहले यहां त्रिकोणीय प्रेम के बारे में जिक्र किया गया था। इनका (उन्मुक्त का) भी त्रिकोणीय प्रेम है। यह जब घर में होते हैं तब,
  • इनके हांथ में कोई पुस्तक होती है; या फिर 
  • इनकी उंगलियां कंप्यूटर के की-बोर्ड पर थिरक रहीं होती हैं; या फिर
  • क्या बताऊं - टौमी इनकी गोद में और बड़ी बड़ी जीभ से इनके चेहरे को चाट रहा होता है। छी...।
मुझे नहीं मालुम कि,
  • इन तीनो का क्या क्रम है, क्या वे इसी क्रम में हैं या किसी और क्रम में हैं;
  • मैं इन तीनो के बीच आती हूं कि नहीं;
  • यदि आती हूं, तो कहां आती हूं;
  • यदि नहीं आती हूं तो फिर कहां आती हूं।
शायद मैं इन तीनो के बीच न आकर हलुवा बनाने के लिये - जैसा कि यहां बताया जा रहा है - आती हूं। हांलाकि, मुझे याद है कि 'नेट वेस्ट सीरीज' जीतने के बाद मुझे हलुवा नहीं बनाना पड़ा था। हम लोग अपने शहर के - जो सच में एक कसबा ही है - के सबसे अच्छे रेस्तराँ में आइसक्रीम खाने गये थे। आप सही सोच रहें हैं, कार में पीछे बैठ कर टौमी भी गया था। हम सब लोगों को सिंगल संडे खाने को मिली पर टौमी को ट्रिप्ल संडे खाने को मिली। हम सब कई थे, टौमी तो अकेला है - पैसे की किफायत तो करनी ही थी।

मैंने सुश्री सेन की इमेल का जवाब ज्लदी में दिया था। जवाब जल्दबाजी में लिखने के कारण, व्याकरण की कुछ गलती हो गयी थी। मेरे पास पढ़ाने का काम तो है ही, उसके साथ घर में भी काम की कमी नहीं है:
  • इनको कुत्ते का शौक है;
  • मुन्ना अपनी दुनिया में है - चिड़ियां, मकड़े, बिच्छू, और मछलियां पालने का शौक रखता है।
(मुन्ने का कहना है कि बिच्छू ऊपर की ओर डंक मारता है। यदि हांथ, बिच्छू के ऊपर है तो वह डंक मार देगा पर यदि बिच्छू, हांथ के ऊपर है तो कुछ नहीं होगा।)


स्पाईडरमैन तो बच्चों के हीरो हैं पर मकड़ा, बिच्छू, यह तो मेरी समझ के बाहर है। यह मकड़ा नहीं, मकड़ी है। इसका नाम लूसी है और इस लिये रखा गया है। मालुम नहीं कैसे लोगों से पाला पड़ा है - ईश्वर ही मुझे इस परिवार के सदस्यों से बचाता है। कभी सोचती हूं कि आजयबघर ही खोल लेती, तो अच्छा रहता। इन लोगों को शौक तो तरह तरह के हैं पर इन सब को देखने का काम मेरा है। इसलिये समय की कमी रहती है। व्याकरण की गलती ठीक करते हुऐ, सुश्री सेन को मेरा जवाब यह था।,
I am Munne ki maa. I write one blog 'Munne ke bapu'. Unmukt is my husband. He writes three blogs 'Unmukt', 'Chutput', 'Lekh' and does one podcast at 'Bakbak'.


We did see one article in Telegraph about Hindi blogging. It was a nice article.


I am glad that you liked my blog and am sure you will like Unmukt's blogs more.


We are from a small town and blog as ordinary citizens of India. Identities often blur others' thinking. We try to bring out the aspirations of common man and wish to remain the same.


The list of active bloggers is here. I am sure almost all of them will love to talk to you. You can know more about them from their blogs.

चलती हूं, मेरी बंगाली सहेली ने मसटर्ड फिश बनाना सिखाया है। आज मछली आयी है। मसटर्ड फिश बनानी है। यह भी किसी इम्तिहान से कम नहीं। इस पोस्ट लिखने में तो उंगलियां ही टूट गयीं।


इनके तीनो चिट्ठों एवं पॉडकास्ट की प्रविष्टियां, इनके किसी अज्ञात मित्र द्वारा

Unmukt - उन्मुक्त हिन्दी चिट्ठाकार उन्मुक्त - Unmukt की चिट्ठियाँ

इनके बारे में कुछ अन्य लोगों के विचार पढ़े जा सकते हैं।


इन्होंने स्वयं अपने परिवार के बारे में निम्न चिट्ठियों में लिखा है जिसे आप पढ़ सकते हैं।


इनके अन्य लोगों के द्वारा लिये गये साक्षात्कार


मेरे द्वारा इनके बारे में लिखी कुछ चिट्ठियां


नोट-१: मैंने इस चिट्ठी में लिखा है,
'मेरे चिट्ठे की चिट्ठियां कॉपीलेफ्टेड नहीं हैं, वे मेरी हैं। महंगाई है, क्या मालुम कभी दो पैसे कमा लूं।'
इसका कारण था कि मैं तो यही यही सोचती थी कि मेरे चिट्ठे की सामग्री महत्वपूर्ण नहीं है इसलिये लोग इसका प्रयोग नहीं करना चाहेंगें - बस इसीलिये यह बात लिख दी थी। वास्तव में मेरे चिट्ठे की सामग्री को प्रकाशित करने की शर्ते यह हैं,
'आपको इस इस चिट्ठे में प्रकाशित सामग्री को - चिट्ठे का आभार प्रकट करते हुऐ अथवा उस चिट्ठी से लिंक देते हुऐ - इसी प्रकार अथवा संशोधन कर बांटने, या अपने चिट्ठे अथवा विकीपीडिया पर डालने की अनुमति है।'
इस बात को मैंने विस्तार से अपनी चिट्ठी 'सामग्री प्रकाशित करने की शर्तें' नाम से चिट्ठी पोस्ट की है।

Thursday, November 23, 2006

हरिवंश राय बच्चन: रूस यात्रा

मुन्ने के बापू आजकल अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर बच्चन जी की जीवनी के बारे में लिख रहें हैं। इसकी सबसे नवीनतम ग्यारवीं पोस्ट यहां है। इसमें बच्चन जी के रूस जाने की चर्चा है। वे वहां बीमार हो गये। वे इस अनुभव को इस प्रकार से बताते हैं,
'विदेश में कोई बीमार न पड़े, खासकर ऐसे विदेश में जहाँ उसकी भाषा न समझी जाय, या वह वहां की भाषा न समझे। इस दुर्भाग्य का शिकार भी मुझे होना था।'
बच्चन जी को रूस में अस्पताल से तब तक नहीं छोड़ा गया जब तक उन्होनें यह नहीं कह दिया कि वे ठीक हो गये। बच्चन जी इसे कुछ इस प्रकार बताते हैं,
'मुझसे पहले किसी ने गंभीरतापूर्वक या मजाक-मजाक में कहा था कि रूसी अधिकारी अस्पताल में दाखिल होने पर मरीज को या तो अच्छे होने पर बाहर जाने देते हैं, या फिर उसकी लाश को। वे नहीं चाहते। वे नहीं चाहते कि मरीज़ बाहर जा कर कहे कि उसका मर्ज़ रूसी डाक्टरों से अच्छा नहीं किया जा सका।'
मुझे कभी, कभी विदेश सम्मेलनो में जाना पड़ता है और एक बार रूस भी जाना पड़ा। इन्होने मुझसे यह पूछा कि क्या रूस में ऐसा होता है। यह सच है कि विदेश में बीमार पड़ना दुखदायी है और ऐसे देश में जहां लोग आपकी भाषा न समझे वह और भी। मुझे एक बार रूस जाने का मौका मिला था पर मैं वहां बिमार नहीं पड़ी। इस लिये यह तो नहीं बता सकती कि ऐसा होता है कि नहीं पर मुझे भी रूस में उन शहरों में जाने का मौका मिला ,जहां बच्चन जी गये थे। उनके संस्मरण के बारे में आप उनकी जीवनी के चौथे भाग में पढ़ सकते हैं। मैं तो वहां के, अपने अनुभवों के बारे में बता सकती हूं।

लगभग बीस वर्ष पहले, मैं एक कान्फ्रेन्स में बाकू गयी थी। यह शहर एजरबजान में है और कैस्पियन समुद्र के तट पर बसा है। कॉन्फ्रेन्स का आयोजन समुद्र के तट पर बने एक सैनिटोरियम में किया गया था। सब लोग एक हाल में भोजन करते थे, जहां अक्सर गुजिया एवं अन्य पकवान खाने को मिलते थे।

विश्व के मशहूर शतरंज खिलाड़ी कैस्पारोव बाकू के हैं। पूरे शहर में जैसे शतरंज छाया रहता था, जैसे यहां पर क्रिकेट। पेड़ों के नीचे, व्यक्तियों को शतरंज खेलते अक्सर देखा जा सकता था। मैंने वहां से कुछ समान लिया था वह अब भी मेरे पास है। उसे आप भी देख सकते हैं।

यहां सभी ने कहा कि रूस जा रही हो तो लेनिनग्राड अवश्य जाना, वह उत्तर का ‘वेनिस’ कहलाता है। मैं वहां भी गयी थी। वहॉं पहुँच कर मैंने देखा कि पूरे शहर में नहरें बह रही हैं जो कि समुद्र में जाकर मिलती हैं। वहां का सेन्ट पीटर्सबर्ग संग्रहालय विख्यात है।

लेनिनग्राड में कुछ भारतीय लड़के लड़कियों से भेंट हुई जो वहां पढ़ने के लिए गये हुए थे। उन्होंने मुझे भारतीय खाना बनाकर खिलाया- दाल, चावल और पापड़ की रसेदार तरकारी बनायी। मुझे खरीदारी कराने भी ले गये जहां से मैंने परिवार के लोगों के लिए मफलर और टोपे खरीदे। मेरे ससुर तो सर्दियों मे अभी भी उन्हे ही पहनते हैं। लेनिनग्राड में सब्जी की दुकान पर सिर्फ आलू बिकता दिखाई देता था और फल की दुकान पर केवल हरा सेब - पता नहीं, वहां अब क्या क्या मिलता है।

वापस भारत आने के लिए, मॉस्को से होते हुए आना था। मैं मॉस्को विश्वविद्यालय देखने गयी जो मॉस्कवा नदी के किनारे बना हुआ है। सभी इमारतों में एक अद्भुत सुन्दरता थी। मॉस्को में उस समय भारतीय राजदूत श्री टी.एन.कौल थे। मैंने उनसे फोन पर बात की। उन्होंने कहा कि वे एक समारोह में जा रहे हैं नहीं तो हमसे भेंट करते। सबसे प्रसन्नता की बात है कि वे शुद्ध हिन्दी में बोल रहे थे। हाँ, मॉस्को के सब-वे स्टेशन अपनी सुन्दर मूर्तियों और स्वच्छता के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। मैंने उसको भी देखा।

मैंने रूस में कई चित्र भी लिये थे पर वे इधर उधर हो गये। केवल एक फोटो मॉस्को विश्विद्यालय का बचा है जो यह है।

जिस समय मैं रूस गयी थी वह समय रूस देश के लिये बहुत मुश्किल का समय था। नये बदलाव आने को थे और लोग कुछ डरे से लगते थे, मुझे कोई भी हंसता हुआ नहीं दिखता था। यह बात कुछ अजीब सी लगती थी।